Saturday, April 14, 2018

मैं भारत का एक हिन्दू हूँ

ना पढ़ी है गीता मैंने,
ना वेदों का मुझे ज्ञान है
जानता ये भी नहीं कि
कितने सारे भगवान् हैं

ना कोई पैग़म्बर है मेरा
ना नियत धार्मिक संस्थान है
मानता ये भी नहीं कि
सर्वश्रेष्ठ कोई प्रतिष्ठान है

मैं गंगा हूँ, कावेरी हूँ
मैं सतलज हूँ, मैं सिन्धु हूँ
सदियों से चलता आया हूँ
मैं भारत का एक हिन्दू हूँ 

मंदिरों में जाता हूँ मैं, मगर 
दरगाहों पर भी सर मेरा झुक जाता है
पूजाओं में भीड़ मेरी जुटती है, लेकिन   
गुरुद्वारों में भी पांव मेरा रूक जाता है 

श्लोक और मंत्र मुझको आते नहीं हैं
संस्कृत के शब्द मुझसे बोले जाते नहीं हैं
मन मेरा कितना भी मैला हो मगर
प्रार्थनाओं में भाव बुरे आते नहीं हैं

मैं आयत हूँ, मैं त्रिभुज हूँ
मैं परवलय हूँ और मैं बिंदु हूँ
सदियों से ढलता आया हूँ
मैं भारत का एक हिन्दू हूँ 

हैं त्रुटियां मेरे समुदाय में,
उन त्रुटियों से लड़ता आया हूँ
गिर गिरकर उठा हूँ लाखों बार
तब ही अस्तित्व बचा पाया हूँ

जो लूटा उसे भी अपनाया है
अपनों से भी जा टकराया है
जब-जब तुम कहते हो मुझे इन्टॉलरेंट
मैंने अपने को छोटा पाया है

मैं ब्राह्मण हूँ, दलित भी हूँ
गुप्ता, चौधरी, गुन्डू हूँ
सदियों से पलता आया हूँ
मैं भारत का एक हिन्दू हूँ 

Thursday, April 12, 2018

प्रेयसी

हर सुबह, 
भोर की मृदु रौशनी 
जैसे छन के आती है 
बादलों से  
और फूँक जाती है 
अपना नि:स्वार्थ प्रेम
फूलों पर, पत्तों पर
दरिया और दरीचों पर 
वैसे ही मासूमियत से
तुम आती हो 
मेरी ज़िन्दगी में
हे प्रेयसी, 
हर सुबह  

Monday, March 05, 2018

अगर कंप्यूटर में मूवी अपलोड करे तो कंप्यूटर का वजन बढ़ता होगा क्या? ये बाइनरी डाटा कंप्यूटर में स्पेस के साथ और कौन कौन सा आयाम छेंकते हैं? अगर आपको किसी से प्रेम या नफ़रत हो तो ये विचार आपके मस्तिष्क में किस फॉर्म में रहते हैं? मृत्यु के बाद ये विचार शरीर छोड़कर जाते होंगे या शरीर में ही रह जाते हैं? यदि प्रेम और घृणा की ऊंचाई, लम्बाई और चौड़ाई नहीं होती, कोई भार नहीं होता, कोई रंग या रूप नहीं होता तो उनका अस्तित्व कैसा होता है?

हर सुबह उस ओवर-ब्रिज पर एक औरत को देखता हूँ, जो अपनी छोटी बच्ची को सुलाकर भीख मांगती है| बच्ची के सर पर सफ़ेद पट्टी बंधी रहती है, जो सुर्ख़ लाल रंग में सनी रहती है| तक़रीबन एक साल से देख रहा हूँ| पहले उसके बदहाली पर दया आती थी, अब उसके फ़रेब पर गुस्सा आता है| मेट्रो पकड़ने के पहले उसे देखता हूँ तो सोचता हूँ कि उस औरत को इस फ़रेब पर गिल्ट आता होगा या नहीं| या शायद उसे अपने अस्तित्व बचाये रखने के लिए ये करना पड़ता होगा? दोनों ही सूरत में, वो औरत अपने ख़यालों के बोझ को कैसे झेलती होगी| क्या ख़यालों का बोझ होता है?

Sunday, November 05, 2017

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ 
जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.

Happy Birthday

साल दर साल 
वक़्त चुपके से आकर 
अपने हँसिया से 
काट जाता है 
उम्र का एक और साल; 
और पीछे छोड़ जाता है
सर-कटा नंगा सा ठूँठ|

Sunday, August 13, 2017

ये "हम लोग" वाले लोग जब inert या blind हो जाते हैं तो स्थिति बहुत डरावनी हो जाती है|

एक और 15 अगस्त आने वाला है| बहुत कुछ वैसा ही होगा, जैसा हर साल होता है| Facebook और twitter पर profile picture बदल दिए जाएंगे; whatsapp पर तिरंगे वाले GIF के साथ बहुत सारे देशभक्ति वाले forwards आएंगे; TV के किसी कोने में प्रलय नाथ गेंडास्वामी और ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह लड़ते दिखेंगे; स्कूलों और दफ़्तरों में जोश से भरे भाषण दिए जाएंगे; गांधी, नेहरू, पटेल, भगत, आज़ाद को याद किया जाएगा; बॉर्डर पर खड़े सैनिकों के लिए emotions से भरे विचार लिखे जाएंगे और अंततः देश की बदहाली के लिए नेताओं, बाबुओं और सरकारी कर्मचारियों को कोसा जाएगा| इन्हे हर साल कोसा जाता है, और क्यों ना कोसा जाए -- अपने लालच को पूरा करने के लिए इन्होने आम जनता को इतना निचोड़ दिया है कि अब dry cleaning भी हमारी सिलवटों को हटा नहीं पाते| 

वैसे तो भ्रष्टाचार और बदहाली के लिए नेताओं, बाबुओं और सरकारी कर्मचारियों को कोसना हमारा staple diet बन चूका है, लेकिन एक culprit है, जो हमेशा बच जाता है -- जो अपने फ़ायदे के लिए इन बाबुओं को पैसा खिलाता है, लेकिन बाद में corruption का राग रोता है; जो सड़कों पर चलते समय केले का छिलका फेक आता है, लेकिन गन्दगी पर municpial corporation से उसकी ज़िम्मेदारी पूछता है; जो घूस मांगने के लिए किसी भी हद्द तक गिर जाता है, लेकिन पैसों की कमी से पढाई ना कर पाने वाले बच्चों पर दुःख जताता है; जो ट्रैफिक में पांच मिनट फंस जाने पर हॉर्न देकर लोगों का कान फाड़ देता है, लेकिन उसे देश में अनुशाषन की कमी दिखती है|  

जी, आप बिलकुल सही पकड़े हैं| ये Constitution के preamble में लिखे गए "We the people of India" वाले वही लोग हैं, जो दशकों से बस दूसरों पर ऊँगली उठाते आये हैं, लेकिन अपने रिश्तेदारों की ऊपरी कमाई को बहुत शान से बताते हैं|  ये संविधान के प्रस्तावना में बताये गए "हम, भारत के लोग" वाले वही लोग हैं, जिन्हे दहेज लेने वालों पर गुस्सा आता है, लेकिन जैसे ही उनका बेटा IAS बनता है, दहेज की बोली पचास लाख पहुंच जाती है| ये "हम लोग" हैं|

पिछले सत्तर सालों में हम लोगों ने सड़क और पुल कम बनाये हैं, लेकिन वाद और ism बहुत ज्यादा बना दिया है -- गाँधीवाद, समाजवाद, लोहियावाद, जातिवाद, Right Wing, Left Wing, Center Right, Center Left, Nehruvian, Savarkarian...और मुश्किल ये है कि इतना सारा हमसे हज़म भी नहीं हो पाता इसलिए हम अलबला जाते हैं| जब भी कोई tragedy हो जाए, सबसे पहले हम ये देखते हैं कि ये किस "ism" में फिट होता है, उसके बाद ये खोजते हैं कि इस "ism" का जिम्मा किसपर थोपा जाए ताकि मेरा वाला "ism" बच जाए| इस "ism" वाली लड़ाई में tragedy जीत जाती है और हम हार जाते हैं, लेकिन हम इतने अभागे हैं कि उसे भी हम आँख बंद कर अपना जीत मान लेते हैं| ये "हम लोग" वाले लोग युद्ध में लड़ने वाले वो प्यादे हैं जिन्हे विजय के गंतव्य और युद्ध की दिशा से कोई मतलब नहीं| इन्हे बस इससे मतलब है कि आप किस side खड़े हैं|   

तीन दिन पहले रांची में एक wrestler की करंट लगने से मौत हो गयी| स्टेडियम की हालत इतनी जर्जर थी कि फोटो से भी आंसू टपक रहे हैं| ख़बर जब फैली तो देश ख़ेमे में बंट गया:

1. एक वर्ग चाहता था कि दोषियों को लटका दिया जाए| ये ऐसा वर्ग है जो हमेशा दोषियों को लटका देना चाहता है, लेकिन जब इनके घरों में बैठे रिश्तेदार सड़कों में सीमेंट की जगह रेत डालकर पैसा बनाते हैं, सरकारी हॉस्पिटल या सरकारी कॉलेज में छुट्टी मार कर प्राइवेट इंस्टिट्यूट चलाते हैं, दफ़्तरों में घूस लेकर घर लौटते हैं तो ये चुप रह जाते हैं| 

2. दूसरे वर्ग ने घटना का पोस्ट-मार्टम राजनीति के औजारों से कर दिया| अपने सुविधा और स्वादानुसार नेहरू को, मोदी को, RSS को, दलितों को, हिन्दुओं को, मुसलमानों को दोषी और पीड़ित बनाकर लाश पर कफ़न पहना दिया  

3. तीसरा वर्ग inert हो चूका है| इतने लोग तो मरते ही हैं, एक और मौत हो गयी तो हो गयी| जब सरकार और सिस्टम बदलने से भी कुछ नहीं होता, तो बहुत सारे लोग inert होने लगते हैं| 

स्टेडियम का क्या हुआ किसी को नहीं मालूम| कितने खिलाड़ियों का मनोबल टूटा इससे कोई मतलब नहीं| हाँ, लेकिन हमने इसका जिम्मा किसी के सर थोप दिया| 

गोरखपुर में बच्चों की मौत पर भी ऐसा ही कुछ हुआ| कश्मीर में भी ऐसा हो रहा है|  

बारिश में सड़के पिघल जाती हैं और लोग गड्ढ़ों में डूब कर मर जाते हैं लेकिन हम अपनी political party पर ऊँगली उठाने वालों को ट्रोल कर के सारा दर्द मिटा लेते हैं ; जब व्यापम में, बिहार में, केरल में और बंगाल में whistle blowers रातो रात गायब हो जाते हैं, हम अपने "ism" को सही ठहराने के लिए आँखें बंद कर लेते हैं;  कोई anti-national को खोज लेता है, कोई संघी मोदी भक्त को, तो कोई आपटर्ड को| कुछ नहीं मिलता है तो हम राहुल गाँधी पर ही चुटकुला बना लेते हैं| समस्या वही की वही रह जाती है| 

ये "हम लोग" वाले लोग जब inert या blind हो जाते हैं तो स्थिति बहुत डरावनी हो जाती है| हम अभी उसी स्थिति से गुज़र रहे हैं| 

कुछ लोग कहते हैं "थाली का बैगन मत बनो, साइड लो"| "साइड लो"? किसका? किसके लिए? भाई polygon हो क्या जो साइड लेकर ज़िन्दगी गुज़ार दोगे? रात को नींद कैसे आ जाती है?

खैर, पंद्रह अगस्त आ रहा है| whatapp forward कीजिये, दिल खोलकर दूसरों को कोसिये और जानी दोपहर में किसी चैनल पर तिरंगा तो आएगा ही| 

Sunday, June 11, 2017

इश्क़ मुहब्बत वाला लौंडा जब झंडा लेकर घूमने लगा

2012 के मई की चिलचिलाती गर्मी चीटियों की तरह शरीर पर चुभ रही थी| ज़मीन एक एक क़तरा पानी के लिए ललचाये निग़ाहों से आसमान की तरफ़ ताक रहा था, लेकिन बादल भी जिद्दी और बदमिज़ाज महबूबा की तरह रूठ कर यूँ कहीं दूर चले गए थे कि दूरबीन से ढूंढने पर भी नहीं दिखते| गर्म सांस छोड़ती हुई सड़कों के किनारे लगे छोटे छोटे पौधे झुलस कर अस्पताल से निकले गरीब बूढ़े मरीजों की तरह अपने जीवन और मृत्यु पर विचार कर रहे थें|

पटना कॉलेज में अभी-अभी इतिहास का एक लेक्चर ख़त्म हुआ था| लेक्चर-रूम में जिराफ़ के गर्दन की तरह चारो ओर लटके पंखों से "घूं-घूं" की आवाज़ के साथ हवा भी आती थी लेकिन तापमान इतना ज्यादा था कि उससे कोई अंतर नहीं पड़ता| लोग कहते पटना हैं कि कॉलेज की ये शाही इमारतें अंग्रेजो ने बनवायी थी लेकिन लाल पीली दीवारों से फ़िसलती और टपकती पपड़ियों को देख कर ऐसा लगता था कि ये दीवारें बौद्ध काल में बनायीं गयी थीं|

कॉलेज के सामने एक बड़ा सा मैदान है जिसमे अगल बगल के कई सारे बच्चे क्रिकेट खेलने के बहाने ग़रीबी और लाचारी के दर्द को थोड़ी देर तक ढक लेते थे| मैदान के एक छोर पर अकेले बैठा हुआ विहान मैदान में ताक रहा था| विहान से यदि कोई पूछता कि मैच में क्या हो रहा है तो शायद वो बता नहीं पाता, शायद उसे अहसास भी नहीं होगा कि कोई मैच चल रहा है, लेकिन पिछले एक घंटे से बैठकर वो मैदान में खेलते हुए बच्चों की ओर देख रहा था| गर्मी थमने का नाम नहीं ले रही थी और ऊपर से कॉलेज के कई सारे बोरिंग क्लॉस| विहान देख तो मैदान की तरफ़ रहा था लेकिन उसके दिमाग में आने वाले कल और बीते हुए कल की तस्वीरें खटाखट घूम रही थीं|

ये पहली बार नहीं था जब विहान यूँ अकेला बैठ कर अपने बारे में सोच रहा था| महीने में एक दो बार अपने दोस्तों से दूर एकांत में एक दो घंटे बैठ कर विहान कुछ अजीब अजीब विषयों पर जैसे कि "ग़रीबी का क्या अंत है", "क्या दूसरे ग्रहों पर जीवन है", "इतिहास वाले प्रोफ़ेसर को नौकरी में किस चीज़ से तसल्ली मिलती होगी", "अल्ताफ राजा की गर्लफ्रेंड होगी क्या" सोच लेता था और फिर भूल जाता था| ये एक दो घंटे उसके मशीन की तरह चलती ज़िन्दगी में lubricant जैसा काम करती थी|

"भैया, एक कोला वाला आइसक्रीम देना", विहान के पीछे खड़े आइसक्रीम वाले से एक लड़की ने पुछा

विहान पीछे पलट कर देखा और तीस सेकंड के अंदर उसे लड़की से प्यार हो गया|  उसने लड़की की तरफ़ देखा, लड़की ने उसकी तरफ़ देखा; विहान के लिए मौसम का मिज़ाज सुधर गया और तापमान पंद्रह डिग्री कम हो गया| ये सब पांच मिनट के लिए हुआ और फिर ख़त्म हो गया| लड़की गेट नंबर तीन से अशोक राजपथ की तरफ़ निकल गयी| विहान ने ना तो उसका नाम पूछा, ना मोबाइल नंबर और ना ही ये पूछा कि किस कोचिंग सेंटर या कॉलेज में वो पढ़ रही है| दो दिन तक विहान का मन किसी चीज़ में नहीं लगा| विहान कॉलेज तो जाता था लेकिंग लेक्चर हॉल की जगह मैदान के उस कोने में बैठता था जहाँ उसे वो लड़की पहली बार दिखी थी| शाम को घर जाकर वो "चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला" सुनता था तो कभी कुमार सानू के साजन के गाने सुनता था|

ये भी पहली बार नहीं था कि विहान को इश्क़-मुहब्बत-कोकाकोला हुआ था| विहान को हर कुछ महीनों में प्यार हो जाता था| फिर वो रातों को ग़ुलाम अली, जगजीत सिंह और कुमार सानू के गाने सुनता, शायरी सुनता, गाने गाता और कुछ दिनों बाद सब कुछ भूल जाता|

असल में विहान एक सामान्य लड़का था| उसमे कोई सुपरपावर नहीं था ना ही उसके जन्म के समय ज्योतिषियों ने बोला था कि ये लड़का बवाल मचाएगा| विहान एक खुशमिज़ाज क़िस्म का लड़का था| विहान दोस्तों के साथ बैठ कर हंसी मज़ाक करता था, उसके दिमाग में उल जलूल प्रश्न आते थें, उसे गुस्सा आता था, उसे परेशानी होती थी, उसे प्यार होता था| कॉलेज, मोहल्ले और राज्य में नेताओं को कई बार उल्लू बनाते हुए देखने के बाद राजनीति में उसकी दिलचस्पी ख़त्म हो गयी थी| विहान को बुरी ख़बरें पढ़कर बुरा लगता था, अच्छी ख़बर पढ़कर अच्छा लगता था| विहान एक सामान्य लड़का था|

2017 की मई में गर्मी पहले से भी ज्यादा बढ़ गयी है, लेकिन अब विहान को इश्क़-मुहब्बत-कोकाकोला रास नहीं आता| अब विहान जैसे लड़कों को शायरी और ग़ज़लें पसंद नहीं आती| उनके तकियों के नीचे ग़ालिब और फैज़ की शायरी नहीं होती| वो अकेले  बैठते तो हैं, लेकिन मोबाइल के updates के साथ| सब के सर पर मुहर लगा दिया गया है| अलग अलग पार्टियों और अलग अलग वादों का| कोई राइट विंग है, कोई अलगाववादी है, कोई विराट हिंदू है, कोई आपटर्ड, कोई जिहादी एंटी नेशनल, कोई मोडिटार्ड, कोई संघी, कोई सिकुलर| अब कोई भी सामान्य नहीं है|

लोग कहते हैं कि कोई बड़ा सा युद्ध चल रहा है -- विचालधराओं का युद्ध| इसलिए सब जायज़ है|  इंटरनेट पर चौबीसो घंटे हज़ारो लोग आपके एक शब्द का इंतज़ार करते हैं और आपके कुछ बोलते ही विपक्षी खेमे वाले आपके शब्दों को चीड़ फाड़ करके उसमें से misogyny, bigotry, sickulasim, fanatism, communalism सब निकाल देंगे| आप बस अपना पक्ष पकड़ लीजिये और उसके साथ आँख बंद कर के जुड़ जाइये| अपने पक्ष की गलतियों पर बोलना कमज़ोरी की निशानी होगी और ऐसा करने पर आपको थाली का बैगन घोषित कर दिया जाएगा|

खड़े रहिये, लड़ते रहिये, टीके रहिये| आप एक महायुद्ध का हिस्सा बन चुके हैं जिसका आपको कुछ पता भी नहीं| 

मैं भारत का एक हिन्दू हूँ

ना पढ़ी है गीता मैंने, ना वेदों का मुझे ज्ञान है जानता ये भी नहीं कि कितने सारे भगवान् हैं ना कोई पैग़म्बर है मेरा ना नियत धार्मिक संस्...